Papita

Papita


इस पोस्ट में हम Papita,Papita khane ke fayde,Kacha Papita,Paka Papita,Papaya जिसे हम हिंदी में पपीता कहते हैं के बारे में बात करेंगे।

पपीता विविध नामों से जाना जाता है।Papaya in hindi- हिन्दी में इसको पपीता, पापीता, अरंड-खरबूजा, ककड़ी या वातकुम्भ।papita in English- इंग्लिश में पपाया (Papaya) और सेंट इग्नेशियस बीन (St. lgnatius bean), तथा लैटिन में स्ट्रिक्नोस इग्नेशियाई (Strychnos Ignatii) कहते हैं।

गरम देशों में पाये जाने वाले फलों में पपीता की गिनती श्रेष्ठ फलों में की जाती है। सोलहवीं शताब्दी के अंत या सत्रहवीं शताब्दी के आरम्भ में यह फल पुर्तगालियों द्वारा भारत में लाया गया। इसकी जन्मभूमि उत्तरी अमेरिका का मेक्सिको प्रदेश है । मेक्सिको से यह धीरे-धीरे अन्य देशों में फैला ।


पपीता फिलिपाइन द्वीप तथा कोचीन चाइना में बहुतायत से पैदा होता है। उधर से ही इसके बीज भारत आदि देशों में निर्यात होते हैं। चूंकि पपीता का बीज एक विदेशीय बीज है, इसलिए प्राचीन काल में इसका उपयोग भारत में न होने के कारण भारत के आयुर्वेदीय ग्रन्थों में इसका उल्लेख नहीं है।


Papita का पेड़ सामान्यतः १० फुट से ३० फुट तक ऊँचा होता है, तथा पत्ते एरण्ड (अरण्ड) के पत्तों की तरह होते हैं । छाल का रंग सफेद होता है और फल पत्तों के बीच तने में लगते हैं। कच्चे फल का छिल्का हरा और गूदा सफेद होता है । लेकिन पक जाने पर इसका छिल्का कुछ केसरिया रंग का हो जाता है।


फलों को कृत्रिम रूप से पकाये जाने पर वे पीले तथा सुन्दर दिखते हैं। किन्तु स्वाद की दृष्टि से पेड़ पर पका पपीता ही अच्छा होता है।


पपीते का पेड़ बड़ी तेजी से बढ़ता है। एक साल में ही फल देने लगता है। कभी-कभी तो पपीते के पेड़ में इतने अधिक फल लग जाते हैं कि पेड़ के टूट जाने का भय उत्पन्न हो जाता है।


ऐसी दशा में उनमें से थोड़े कच्चे फलों को तोड़ लेना ही श्रेयस्कर रहता है। पेड़ मुलायम और भीतर से खोखला होने के कारण फलों का अधिक भार शहन नहीं कर सकता ।


पपीते की कितनी ही किस्में हैं, जो आकार, आकृति, रंग, गंध और स्वाद में भिन्न हैं। उनमें से एक किस्म ऐसी भी है जिसमें बीज होता ही नहीं।


भारतवर्ष में पपीते की मुख्यतः तीन जातियाँ पायी जाती हैं। प्रथम पर्वतीय पपीता, जो प्रायः पहाड़ी प्रदेशों में ४५०० से ७००० फुट तक की ऊँचाई पर होता है। यह लंका और दक्षिणी भारत के नीलगिरी पर्वत पर चलने वाले तेज झोकों को भी सहन कर लेता है। दूसरी जाति के पेड़ ५-६ फुट ऊँचे होते हैं। तीसरी जाति के पपीते को लैटिन भाषा में केरिका पपाया कहते हैं। यह सामान्य रूप से पायी जाने वाली जाति है। इसके पेड़ १० फुट ऊँचे होते है। ये पौधे प्रायः लम्बे या गोल फल धारण करते हैं।


भारत में पपीते की खेती सबसे अधिक बिहार में होती है । वहाँ ४००० हेक्टेयर भूमि में पपीता बोया जाता है। इसके अलावा आसाम, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल, केरल तथा उत्तर प्रदेश में भी इसकी पैदावार होती है।


फलतः अब यह एक तथ्यपूर्ण बात है कि आज यह फल हमारे देश में पर्याप्त लोकप्रियता प्राप्त किये हुए है।


Papita khane ke fayde


Papita khane ke fayde


आयुर्वेदानुसार कच्चा पपीता मलरोधक, तथा कफ और वात को कुपित करनेवाला होता है।


खूब पका फल खाने में मधुर, रुचिकर, पित्त- नाशक, भारी और स्वादिष्ट होता है। पपीता ज्यों- ज्यों पकता जाता है, उसमें विटामिन बढ़ते जाते हैं।


इसीलिए पेड़ का खूब पका पपीता सबसे अधिक लाभकारी और उत्तम होता है। ऐसे पपीते में रेचक गुणों की अधिकता के कारण वह पेट के रोगियों के लिए बहुत गुणकारी सिद्ध होता है।


पपीते की प्रति आधी छटाँक खाद्य-सामग्री में जीवन दायक १४ कैलोरियाँ प्राप्त हो सकती हैं।


पपीते में पाये जाने वाले विटामिन ए व सी के प्रभाव से शरीर में रोग के कीटाणु पनपने नहीं पाते । निमोनिया, तपेदिक, दमा. एवं नेत्र रोग, स्कर्वी, अग्निमान्द्य, रक्ताल्पता, तथा क्षीणता आदि पपीता का नियमित सेवन करने वालों से दूर रहते हैं; कारण, पपीते में आतों की सफाई करने, उनमें पाचक क्षार का प्राकृतिक स्तर बनाये रखने, तथा पाचन-संस्थान के तन्तुओं को स्वस्थ व सशक्त बना देने के विशेष गुण होते हैं ।


आहार-विशेषज्ञों एवं चिकित्सा-शास्त्रियों का यह भी कहना है कि पपीता अल्पकाल में ही उन सारे विकारों को भी दूर कर देता है जो जीर्णरोग प्रस्तुत करने वाली विषमता उत्पन्न करते हैं ।


एक वाक्य में यदि लिखा जाय तो लिख सकते हैं कि पपीते में शरीर की सफाई करनेवाले सभी तत्त्व मौजूद होते हैं।


पपीता, रोगों की दवा कच्चे और पके दोनों प्रकार के पपीतों को कितने ही रोगों को दूर करने के काम में लाया जाता है । व्यवसायी लोग पपीते की खेती प्रायः इसी दृष्टि से अधिक करते हैं । पेट की गड़बड़ी तथा खराब पाचन की सबसे नयी और अच्छी दवा, तय्यार कच्चे पपीते के रस (जिसे पेप्सीन कहते हैं) से ही बनाई जाती है ।


Kaccha Papita


पपीते की खेती करने वाले लोग पूर्ण विकसित कच्चे पपीते को लकड़ी या हाथीदाँत के चाकू से काट कर उसका रस किसी पात्र में इकट्ठा कर लेते हैं और उसे शीशे के प्लेट पर फैलाकर और हल्की धूप में रखकर सुखाते हैं।


फिर उस सूखे रस को अमेरिका आदि देशों को निर्यात कर देते हैं जिससे उन विदेशों के लोग कई प्रकार की दवाइयाँ बनाकर संसार के कोने-कोने में बेचते हैं ।


यह हमेशा याद रखना चाहिए कि पपीते का रस दवा बनाने के लिये, निकालते समय लोहे के चाकू का प्रयोग बिल्कूल न किया जाय अन्यथा रस काला पड़ जाता है ।


लकड़ी के चाकू से हल्की काट करने से अच्छे कच्चे पपीते से पर्याप्त मात्रा में रस निकल आता है, और ऐसी काट करने से वह काट दो-तीन दिनों में पूर्णतः भर भी जाती है जिससे काट का बुरा प्रभाव पके पपीते के गुण और विकास पर बुरा नहीं पड़ता । कच्चे पपीते से इस प्रकार रस निकालने का उपयुक्त समय प्रातःकाल ही होता है।


कच्चे पपीते से निकाले हुये उपर्युक्त रस को पपीते का दूध भी कहते हैं ।


कच्चे पपीते के रस को एकजीमा पर लगाते रहने से वह कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है ।


शरीर पर कहीं मस्से निकले हों अथवा पाँव में जूते की रगड़ से ठेले पड़ गये हों तो उन पर कच्चे पपीते का रस लगाने से वह कुछ ही दिनों में ठीक हो जायँगे।


इनके अतिरिक्त पेट में पड़े कीड़ों, घावों, फोड़ों, तथा बच्चों के डिप्थीरिया रोग आदि को दूर करने में भी पपीते का रस बड़ा प्रभावकारी सिद्ध होता है ।


कच्चे पपीते के रस से बच्चों के जिगर बढ़ने का रोग भी दूर हो जाता है।


Paka Papita khane ke fayde


पके पपीते का गुण, कच्चे पपीते के गुण से भी बढ़ा चढ़ा होता है। बवासीर के रोगियों के लिये पका पपीता अमृत का काम करता है, परन्तु शर्त यह है कि पपीता पेड़ का पका हो और उसे पेट भर न खाया जाय अपितु उसको दो-तीन फाँके ही खायी जायँ।


कब्ज को दूर करने में पका पपीता अद्वितीय होता है।


पका पपीता सौन्दर्य को भी बढ़ाता है। उसका गूदा लेकर चेहरे पर मलिए और कुछ देर बाद स्नान कर डालिए, आपके चेहरे पर निखार आ जायगा। झाईं तथा कालापन दूर हो जायगा।


पके पपीते के गूदे को सुखाकर मुंह पर लगाने वाला पाउडर भी बनता है जो सर्वोत्तम पाउडर होता है।


Paka Papita


दाद, खुजली आदि चर्म)-रोग-कच्चे पपीते का ताजा रस, दाद, खुजली आदि चर्म रोगों पर लगातार लगाते रहने से इन रोगों से कुछ ही दिनों में मुक्ति मिल जाती है। चर्म रोगों को जड़ से उखाड़ फेंकने में पपीते का रस बड़ा गुणकारी सिद्ध होता है।


पेट के सभी रोग)-पेट में किसी प्रकार की गड़बड़ी हो, अच्छा ताजा पेड़ पर का पका हुआ पपीता खाली पेट खायेँ, कुछ ही दिनों में पेट की सारी गड़बड़ी दूर होकर पाचन-संस्थान सशक्त हो जायँगे ।


दुबलापन)-पपीते का हलुआ तथा खीर शरीर का वजन तथा बल बढ़ाने में एक चमत्कारिक औषधि का काम करते हैं । ये पचने में हल्के और काफी पौष्टिक होते हैं ।


अफरा)-इस रोग में पके पपीते की २-३ फाँके खाने से ही लाभ मालूम होने लगता है।


खूनी बवासीर)-इस रोग में कच्चे पपीते का रस लाभप्रद सिद्ध होता है।


गले के रोग)-कच्चे पपीते का रस अथवा पके पपीते का सेवन करने से गले के रोगों में लाभ होता है।


उच्च रक्तचाप)-उच्च रक्तचाप के रोगियों को सुबह खाली पेट दो-तीन फाँके पके पपीते को रोज खाना चाहिए।


रुका मासिक धर्म)-स्त्रियों के मासिक धर्म में रुकावट होने या कष्ट से होने में पपीते का सेवन लाभप्रद सिद्ध होता है।


हवा पानी का जहरीला असर)-जिस जगह के हवा-पानी में जहरीले तत्त्व मौजूद हों और उसके कारण वहाँ के रहने वालों का स्वास्थ्य ठीक न रहता हो तो वहाँ पर पपीते का सेवन करते रहने से वहाँ के हवा पानी का जहरीलापन प्रभावहीन हो जाता है । पपीते के बीज को पास में रखने से भी वही लाभ होता है।


प्लेग)-प्लेग का रोग होने पर पपीते के बीज को घिसकर और उसमें पानी मिला कर पिलाने से लाभ होता है । उसे प्लेग की गिल्टी पर भी लगाना चाहिए।