Neem ke Fayde|Neem ka ped,Neem


Neem ke fayde


Neem ke fayde

Neem ke fayde: नीम का पेड़ (Neem ka ped )भारतवर्ष का एक ऐसा पेड़ है जिसे छोटे बड़े सभी जानते हैं। आयुर्वेद चिकित्सा में इसका बहुत ही बड़ा योगदान है। आज भी लोग नीम की दातुन करना पसंद करते हैं। नीम जितनी कड़वी होती है उतनी ही ज्यादा इसके स्वास्थ्य लाभ हैं। 


नीम (Neem ke fayde) शीतल छाया कितनी सुखद और तृप्तिकर होती है, इसका अनुभव सभी को होगा। नीम की लकड़ी मकान बनवाने के काम में कितनी मजबूत और टिकाऊ होती है, यह सभी गृहस्थ जानते हैं। परन्तु आँखों के सामने सदैव दीखने-वाले इस वृक्ष में कितने गुण हैं, इसके अंग-प्रत्यंग का भिन्न-भिन्न रोगों में कैसा सफल उपयोग होता है-इसे बहुत कम लोग जानते हैं।



नीम का अंग-प्रत्यंग कटु होता है। परन्तु इसकी कटुता में गुणों की वह मिठास निहित है, जिसके लिए मानव-जाति पर नीम का अपरिमित आभार है। उर्दू की एक लोक-प्रचलित कहावत है-'नीम हकीम', जो कि अधकचरे वैद्य-हकीमों के लिए प्रयुक्त होती है, क्योंकि 'नीम' का अर्थ फारसी में 'आधा' होता है । परन्तु यदि नीम के वृक्ष को ही नीम-हकीम कहा जाय, तो कोई अतिशयोक्ति न होगी; क्योंकि अकेली नीम सैकड़ों रोगों की दवा है।



 नीम में वह कीटाणुनाशक शक्ति मौजूद है कि यदि निरन्तर नीम की छाया में शयन किया जाय तो सहसा कोई रोग होने की सम्भावना न हो। हाँ, सायंकाल नीम के नीचे शयन करने का निषेध है। एक जनश्रुति है कि एक भला- चंगा मनुष्य कार्यवशांत अपने गाँव से कई मील दूर एक वैद्य के पास गया। वह व्यक्ति जिस सड़क से गया था, उसके एक ओर एकदम बबूल के वृक्ष थे और दूसरी ओर नीम के। वह मनुष्य बबूल के वृक्षों की छाया में होकर गया । वैद्य के पास पहुँचते-पहुँचते वह रोगाक्रान्त हो गया । वैद्य ने रोग का लक्षण और कारण जानकर उसे निर्देश किया कि वह लौटती बार नीम के वृक्षों की छाया से होकर जाय । उस व्यक्ति ने वैसा ही किया और घर पहुँचते-पहुँचते स्वस्थ हो गया। 


 
सन् १९३५ ई० में महात्मा गाँधी ने नीम की पत्तियाँ खाकर उसके गुणावगुण जानने का उद्योग किया था। उन्होंने नीम के सेवन के बहुत-से लाभ बताये और बताया कि नीम के सेवन से किसी प्रकार की हानि की आशंका नहीं की जा सकती। इसी सिल- सिले में महात्माजी ने कनर के न्यूट्रीशन रिसर्च डाइरेक्टर डाक्टर इक्राइड के पास नीम की पत्तियों के सम्बन्ध में कुछ प्रश्न भेजे थे, जिनके उत्तर में उक्त डाक्टर महोदय ने लिखा है- काम- "हमने अपनी प्रयोगशाला में नीम की पत्तियों का विश्लेषण किया है। पहले जिन अनेक हरी पत्तियों का विश्लेषण किया गया है, उनके मुकाबले में इन पत्तियों में पोषक तत्त्व अधिक मात्रा में मौजूद हैं ।



 पकी हुई पत्तियों और कोपलों दोनों में ही प्रोटीन, कैल्सियम, लोहा और विटामिन ए पर्याप्त मात्रा में होते हैं। और इस दृष्टि से नीम की पत्तियाँ चौलाई, धनियाँ, पालक तथा दूसरी कई भाजियों से श्रेष्ठ हैं।" वसन्त ऋतु में नीम में पतझड़ होता है और नये पत्ते निकलते हैं। चैत में नीम फूलती है और ज्येष्ठ- आषाढ़ में नीम के फल पकते हैं। चैत मास में नीम की कोमल पत्तियों का सेवन बड़ा गुणकारी होता है। एक स्वास्थ्य-सम्बन्धी कहावत में, जिसमें बताया गया है कि किस मास में किस वस्तु का सेवन करना चाहिये, चैत्र में नीम की कोमल पत्तियाँ खाने का। निर्देश किया गया है।


 
दन्त-रक्षा के लिये, जिस पर बहुत कुछ स्वास्थ्य- संवर्धन निर्भर है, नीम के दातून की उपयोगिता प्रत्येक व्यक्ति जानता है। आयुर्वेद के मतानुसार नीम कटु, शीतल, कफ, व्रण, वमन, कृमि सूजन का नाश करनेवाली, पित्तदोष और हृदय के दाह को शान्त करनेवाली है। वात, कुष्ठ, विष, खाँसी, ज्वर, अरुचि, रुधिर-विकार, प्रमेह को दूर करने-वाली और केशों को हितकारी है। किसी-किसी नीम के पेड़ से एक प्रकार का फेनदार पानी, जिसे नीम का मद व निम्बजल कहते हैं, गिरने लगता है। यह निम्बजल रक्तशोधक और अत्यन्त गुणकारी होता है।


 
नीम का अंग-प्रत्यंग-पत्तियाँ, छाल, लकड़ी, फूल, फल-उपयोगी और औषधयुक्त होता है । यहाँ भिन्न- भिन्न रोगों में नीम के प्रयोग लिखे जाते हैं। 


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Neem ka ped

  

                 रोगों में नीम के फ़ायदे


1. ज्वर में- (१) नीम की सींकें एक तोला, कालीमिर्च ७ नग-दोनों को पीसकर पानी के साथ पीने से सब प्रकार का ज्वर दूर होता है।

 
(२) नीम के फल की गिरी, जीरा सफेद, पीपल-सब चीजें समान भाग लेकर, करेले के रस में २४ घंटे खरल करके सुखा ले । सूख जाने पर पुनः करेले के रस में घोट-सुखाकर कपड़े में छानकर रख ले । इस चूर्ण को चढ़े हुए ज्वर में सलाई द्वारा सुरमे की तरह आँखों में आँजने से ज्वर उतर जाता है ।


(३) नीमपत्र के दो तोले रस को गरम लोहे से छौंक कर पीने से ज्वर नष्ट हो जाता है।

 
(४) निम्बादि चूर्ण-नीम की छाल १० पल, त्रिकुटा ३ पल, त्रिफला ३ पल,  सेंधा नमक, बिड़ नमक तीनों एक-एक पल, सज्जीखार, जवाखार २-२ पल, अजवायन ५ पल-सबको चूर्ण कर रख लें । ६ माशे से १ तोले तक यह चूर्ण सेवन करने से सेंचर नमक, और नीम और उसके सौ उपयोग इकतरा, तिजारी, चौथिया और संतत ज्वर नष्ट होते हैं ।



2. मलेरिया में-
(१) नीम की पत्तियँ १ तोला, भुनी हुई फिटकिरी ६ माशा-दोनों चीजें पानी के साथ पीस - कर १।।-१।। रत्ती की गोलियाँ बना ले ज्वर आने के दो घंटे पूर्व एक गोली फिर एक घंटे बाद एक गोली] खा लेने से मलेरिया ज्वर रुक जाता है।


(२) नीम की छाल, त्रिफला, अमलतास का गूदा, पटोलपत्न, मुनक्का, नेवबाला एक-एक तोला, मिश्री ६ माशे-सबका क्वाथ कर तीन समान भाग कर, ६-६ माशा शहद मिलाकर, दिन में तीन बार पीने से मलेरिया, वात पित्तज्वर दूर होकर मलावरोध दूर होता और भूख लगती है ।

 
(३) नीम की कोपल ६ तोले, श्वेताभस्म ३ तोले-दोनों चीजें एक में खरल कर ३-३ रत्ती की गोलियाँ बना ले । एक गोली मिश्री तथा शीतल जल के साथ देने से मलेरिया ज्वर ‌शर्तिया दूर हो जाता है।



3.कामोत्तेजन के लिए- मेहमिहिर तेल-अनार की छाल सवा तीन सेर, गिलोय सवा तीन सेर, भुमि आँवला सवा तीन सेर- सब चीजों को कूटकर ३२ सेर जल में क्वाथ करे । ८ सेर जल रह जाने पर उतारकर छान ले ,फिर क्वाथ में शुद्ध तिल का तेल दो शेर, गाय का दूध एक शेर, नीम की छाल, अनार का बक्कल, का तेल दो सेर, गाय का दूध एक चिरायता, क्वाथ शुद्ध गोखरू, रेणुका, बेल की छाल, नागरमोथा, त्रिफला, देवदारु, जामुन की छाल, आम की छाल, दाख, तगर- जामुन ये सब चीजें २॥ २॥ तोले मिलाकर धीमी आँच से पकावे । तेलमात्र शेष रह जाने पर उतार ले और शीतल हो जाने पर छानकर रख ले । इस तेल के लगाने से लिंगेन्द्रिय की शिथिलता, पैरों की जलन, शिरोदाह, कृशता दूर होकर कामेच्छा प्रबल हो जाती है ।



4.योनि-रोगों पर-
( १) निबौली और एरण्ड के बीज की गूदी नीम  की पत्तियों के रस में पीसकर लेप करने से योनि की पीड़ा दूर होती है ।

 
(२) नीम की निबौलियाँ नीम के रस में पीसकर योनि में रखने से या लेप करने से योनि-शूल दूर होता है ।


(३) योनि से राध निकलता हो, तो नीम की पत्तियाँ सेंधा नमक के साथ पीसकर गोली बनाकर योनि में रखना लाभप्रद है ।


(४) योनि से दुर्गन्ध आती हो तो नीम की पत्तियाँ, अड़ूसा, बच, कड़वे परवल, प्रियंगु के फूल - इन सबका चूर्ण योनि में रखना चाहिये। पहले अमल- तास के काढ़े से योनि धोना अधिक गुणकारी होगा ।


(५) भग-संकोचन-प्रयोग-बकाइन की सुखाकर पीसकर रखने से योनि सिकुड़कर संकीर्ण हो जाती है ।



5.असमय में केश पकने पर-  नीम की मींगी को एक सप्ताह भाँगरे के रस में घोट-कर सुखा ले और पातालयन्त्र द्वारा तेल निकाल ले । सुबह-शाम इस तेल की तीन बूँदें नास लेने से असमय सफेद हुए केश  पुन: काले हो जाते हैं ।


 
6. केश झड़ने और श्वेत होने पर-
(१) नीम की पत्तियों को पानी में उबाल ले । पानी ठंढा हो जाने पर पत्तियों को अलगकर सिर धोने से बालों का झड़ना बन्द होता है, बाल काले हो जाते हैं और सिर में फुंसियाँ नहीं निकलती ।

 
(२) नीम के बीजों को भाँगरे विजयसार के रस की भावना दे । कोल्हू में बीजों का तेल निकलवाकर इस तेल की नास लेने और दूध-भात खाने से बाल जड़ से काले हो जाते हैं।

 
(३) नीम की पत्तियाँ और बेर की पत्ति्याँ पीस- कर सिर में लगा लो और दो घण्टे बाद धो डालो । इसका एक महीने प्रयोग करने से बाल उग आते हैं ।


 
7.गठिया में-
नीम के कोमल पत्तों, स्वर्णक्षीरी का पंचांग, सँभालू के पत्ते, अमरबेल, काली मकोय के पत्ते- सबको पीस कर गोमूत्र में पकावे । पक जाने पर छानकर गठिया में मलने से अत्यन्त लाभ होता है ।



8. खाँसी-दमा पर-
नीम की पत्तियाँ, साँभर नमक, भाँग सूखी, अड़ूसा कच्चे चना ५-५ तोला लेकर कट-पीसकर टिकिया बना ले और एक मिट्टी के बर्तन में बन्द कर, कपरौटी कर दस सेर जंगली कंडों की आग में फँक दे । ठंढा हो जाने पर उतारकर पीस ले और शीशी में रखे । इस में से रक्ती-डेढ़ रत्ती दवा सुबह-शाम शहद के साथ चाटने से श्वास, कास, बलगमी खाँसी और दमा में लाभ होता है ।



9.फोड़े में-
[१] नीम की पत्तियाँ डालकर उबाले हुए पानी से फोड़ा धोना बहुत लाभदायक है।

 
[२] नीम की पत्तियों को बारीक पीसकर कपड़- मिट्टी कर गर्म कर ले । जब मिट्टी सुर्ख होने लगे तो नीम की लुगदी को निकालकर थोड़ा गर्म ही फोड़े में बाँध दे, तो फोड़ा पककर फूट जाता है और लगातार इसी का प्रयोग करने से घाव भर जाता है।

 
[३] नीम की पत्तियों का रस, भांगरे का रस, सेम की पत्तियों का रस एक-एक छटांक, बबूल की नीम और उसके सौ उपयोग २७ पत्तियों का रस, मेंहदी की पत्तियों का रस-दोनों डेढ़- डेढ़ छटांक, सरसों का तेल एक सेर-सब चीजें एक में मिलाकर, दो सेर पानी डालकर मन्दाग्नि से पकावे । केवल तेल रह जाने पर उतारकर छान ले और ऊपर से आध पाव मोम पिघलाकर डाल दे । इस मरहम के लगाने से भयंकर से भयंकर फोड़ा भी सूखकर जल्दी ही आराम हो जाता है।



10.कान बहने पर- नीम की पत्तियाँ ३ तोले, सरसों का तेल ५ तोले, दोनों एक में मिलाकर जलावे। पत्तियों का अंश तेल में आ जाने पर ६ माशे हल्दी का चूर्ण डालकर जलावे । फिर छानकर शहद मिलाकर रख ले। इस औषध को कान में डालने से कान का बहना तथा अन्यान्य कर्ण-रोग दूर हो जाते हैं।

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