Santara| Orange in Hindi,Santra,Orange.



Santara

Santara


Santara संतरा को संस्कृत में नारंग, नागरंग, त्वक्सुगंध, तथा मुखप्रिय; Orange in hindi हिन्दी, मराठी व गुजराती में नारंगी, नौरंगी, संतरा santara, तथा नारिंग; बँगला में नारेंगा लेबू, तथा कमला लेबू; santra meaning in english अँग्रेजी में चाइनीज औरेंज (Chinese orange), कामन औरंज ( common orange) ; तथा लँटिन में साइट्रस औरेंटियम (citrus aurantium)तथा साइट्र स वल्गेंरिस (citrus vulgaris) कहते हैं । 


संतरा Santara मानव के लिये एक अत्यन्त उपयोगी और उत्तम फल है । जाड़े के दिनों में इसकी खूब बहार रहती है। यूरोप की जनता ने इस फल को 'स्वर्णसेब' का नाम दे रखा है। कुछ लोग चीन को संतरे का जन्मस्थान मानते हैं। भारत, भूमध्यसागर के तटवर्ती प्रदेशों, तथा पश्चिमी देशों में यह फल प्राचीनकाल से पाया जाता है। संतरा एक उत्तम भोज्य पदार्थ तो है ही, इसके अलावा इसके वृक्ष, पुष्प और छिल्के से इत्र निकाला जाता है। सूखे छिल्कों की बहुत सी औषधियाँ बनाई जाती हैं और विविध प्रकार की मिठाइयाँ भी। 


दूसरी सदी में फिलस्तीन, मिश्र और लेबनान में बड़े परिमाण में संतरा पैदा होने लगा था और इस फल के बड़े बड़े बाग लगे होते थे। इसी काल में दक्षिण के देशों में भी संतरा पैदा होने लगा था। स्पेन में संतरा santara सातवीं सदी में पहुँचा । स्पेन से ही कोलम्बस संतरे को नई दुनिया में सन् १४६३ में ले गया। १७ वीं सदी में संतरे का बीज पहले पहल फलोरिडा पहुंचा। इसके बाद तो दक्षिण अमेरिका, दक्षिण अफरीका और आस्ट्रेलिया में इसका बाग लगाया जाना एक साधारण सी बात हो गयी। 


एक खास बात संतरे के सम्बन्ध में यह है कि आम, केला, सेब, पपीता और टमाटर आदि, पेड़ से तोड़ने के बाद कृत्रिम ढंग से पकाये जाते हैं, लेकिन संतरा पकता है केवल पेड़ पर और जब यह पक जाता है तभी तोड़ा जाता है, पहले नहीं। यदि संतरा हरा नहीं है तो समझना चाहिए कि वह पेड़ का पका है भले पेड़ पर पकने में उसे ४-६ महीने लग जाए


। वैसे संतरे के पकने का समय शरद और हेमन्त ऋतु है, परन्तु इस वैज्ञानिक युग में संतरे की नस्लों का इतना अधिक विकास हो गया है कि वर्ष के किसी भी मास में और कभी भी संतरा उपलब्ध हो सकता है। 



 स्वास्थ्यवर्धक गुण



 संतरे में एक साथ २३ स्वास्थ्यवर्द्धक गुण विद्यमान हैं। किसी भी रोग की दशा में जब और कोई खाद्य पदार्थ ग्रहण नहीं किया जा सकता, संतरे का रस धड़ल्ले से ग्रहण किया जाता है जो आश्चर्य- जनक रूप में न केवल रोगी शरीर में ताजगी लाता है और ताकत बनाये रखता है, बल्कि वह रोग के लिये उपकारी भी सिद्ध होता है । इसीलिये लगभग सभी रोगों में इसे बिना खटके और बिना किसी खतरे के दिया जाता है । 


आयुर्वेदानुसार संतरा santara, शीतल, बलवर्द्धक, अम्ल व मधुर, मूत्रल, विषघ्न, रुचिकारक, सुस्वादु और क्षुधा- वर्द्धक होता है, तथा तृष्णा, ज्वर, वमन, रक्तपित्त, अतिसार, कृमि, पाण्डु आदि रोगों का नाशक होता है । यह सौन्दर्य को बढ़ानेवाला, हृदय को प्रिय, भोजन को पचानेवाला, रस, रक्त आदि धातुओं का पोषण करने वाला, रक्त को प्रवाहित करनेवाला होता है। भोजन पर भोजन कर लेने पर भी संतरा उसे शीघ्र पचाकर किसी प्रकार का विकार नहीं उत्पन्न होने देता। संतरा santara हृदय रोगों, वात विकारों, तथा उदर के दोषों को दूर करने में विशेष रूप से उपकारी होता है। क्षय आदि छाती के विकारों में लाभकारी है। पेट के रोगियों को सर्वप्रथम इस फल का प्रयोग कर उसके बाद अन्य खाद्य पदार्थ लेना लाभकर होता है। संतरा santara के गूदे की ऊपर की सफेद झिल्ली जल्दी नहीं पचती, इसलिये संतरा खाने के पहले उसे निकाल फेंकना चाहिए। भोजन कर लेने के बाद संतरे का सेवन करना स्वास्थ्यवर्द्धक है। 


इसके रस में विटामिन ए और बी साधारण मात्रा में, तथा सी विशेष परिमाण में पाया जाता है । अतः इसका सेवन शरीर की प्रतिकारात्मक शक्ति को बढ़ाता है। वाह्य दूषित जीवाणुओं की विकारात्मक शक्ति का प्रतिकार करने में यथेष्ठ सहायक होता है। इसके सेवन से संक्रामक रोग सहसा नहीं होने पाते ।


Santra me konsa acid hota hai

 

रासायनिक विश्लेषण 


Santra me konsa acid hota hai


संतरा santara के रस में शर्करा, लुआब, साइट्रिक एसिड, साइट्रेट आफ पोटाश २.३ % होता है । ताजे फल के छिल्के में व पुष्प में एक प्रकार का हल्का पीला, सुगन्धित कड़वा एवं उड़नशील तेल होता है। जिसे 'निरोली' कहते हैं । फल के छिल्के में एक प्रकार का और स्थायी तेल पाया जाता है, जिसमें सीन, लाइमोनिन, हेस्पीरिडीन तथा औरेशियामेरिन नामक तत्त्व घुले मिले होते हैं। इसके अतिरिक्त टेनिन व क्षार ४.५ प्रतिशत होते हैं। 


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माल्टा, नारंगी, मोसम्मी 



माल्टा, नारंगी, मोसम्मी, संतरे की जाति के ही फल हैं और गुण-धर्म में प्रायः संतरे से मिलते जुलते है । केवल स्वाद में कुछ मामूली अंतर होता है । नारंगी प्रायः कुछ खटमिट्ठी होती है, मोसम्मी मीठी होती है, पर संतरा खटमिट्ठा और पूर्ण मीठा दोनों होता है । कहीं कहीं की नारंगी भी पूर्ण मीठी होती है । फलों के और पेड़ों के आकार भेद से माल्टा नारंगी, मोसम्मी, तथा संतरा santara में भी बहुत थोड़ा ही अन्तर होता है। इन सब कारणों से माल्टा, नारंगी, तथा मोसम्मी का अलग अलग वर्णन नहीं किया गया। 



Santra khane ke Fayde


 

1.कोष्ठबद्धता)-प्रातःकाल नित्य-क्रिया के पश्चात् दो बड़े रसदार संतरों का स्वरस निचोड़ कर और उसमें थोड़ा ताजा ठंढा पानी मिलाकर पीते रहने से थोड़े ही दिनों में पुराने से पुराना कोष्ठवद्धता रोग दूर हो जाता है।


 2.इन्पलुएंजा)-इस रोग में संतरे का स्वरस पानी मिलाकर दिन में ३-४ बार पीने से बडा लाभ होता है । जहाँ पर इन्फ्लुएंजा की बीमारी फैली हो वहाँ के लोग यदि नियमित रूप से रोज संतरे के रस का सेवन करते रहें तो वे इन्फ्लुएंजा की बीमारी से बचे रह सकते हैं। इस रोग की अवस्थाओं में संतरा लाभप्रद एवं सेवनीय है ।


3. हिस्टीरिया)-हिस्टीरिया से पीड़ित युवा स्त्रियों को शीघ्र लाभ पहुँचाने में संतरे का सेवन जादू जैसा प्रभाव दिखाता है । 


4.ज्वर)-संतरे के रस में प्रोटीन का अंश नाममात्र का होने से यह ज्वर के रोगियों के लिये पथ्य और दवा दोनों है । इसके सेवन से ज्वर से होने वाले उपद्रव शान्त रहते हैं । 


5.सभी रोग)-संतरा के मौसम में संतरे का कल्प धारोष्ण गाय के दूध के साथ करने से दाँत के हिलने, पायरिया, मन्दाग्नि, क्षीणता अनिद्रा, पुराना खाँसी, नेत्ररोग, वमन, पथरी-रोग, तथा यकृत- विकार आदि में बड़ा लाभ होता है। कारण, संतरा विटामिन 'सी' को भण्डार होता है और विटामिन 'सी' रोगों को विशेषकर पेट एवं रक्त के रोगों को दूर करने में अद्वितीय है । 


Santra khane ke Fayde


6.खुजली)-संतरे के रस का सेवन करने के साथ- साथ संतरे के छिल्कों को सिल पर पानी के साथ पीसकर शरीर पर मलने से शरीर की खुजली बहुत जल्द दूर हो जाती है । 


7.हैजा)-संतरा के फल को किसी साफ जगह पर रखकर उसे सूखने दें । कुछ दिनों बाद उसमें सूख जाने पर उसे जल के साथ पीसकर चने के बराबर गोलियाँ बनाकर रख लें । जब किसी को हैजा हो जाय और रोगी के और दस्त होने के कारण बेचन हो तब ५ से १० गोलियाँ उसे खिला देने से तुरन्त लाभ होता है । 

संतरा की एक जाति कमला नेबू का प्रयोग यदि संतरा की जगह किया जाय तो लाभ और भी जल्दी एवं उत्तम हो । 

जहाँ हैजा फैला हो वहाँ रोज संतरे का शर्बत सेवन करने से हैजा होने का डर नहीं रहता 


8.टाइफायड)-इस रोग में ज्वर जब से आरम्भ हो तभी से संतरे का रस पिलाते रहने से आगे होने वाले दस्त, खाँसी, निमोनिया आदि नहीं होने पाते। 


9.फोड़ा-फुन्सी)-संतरे के ताजे छिल्कों को फोड़ा- फुन्सी पर रगड़ने अथवा उनको पीसकर लेप लगाने से लाभ होता है । 


10.दाद)-संतरा के छिल्कों को पीसकर पुल्टिस बनावें और दाद की जगह को खुजला कर उस पुल्टिस को उस पर बाँध दें। ऐसा रोज करते रहने से कुछ ही दिनों में दाद ठीक हो जायगा । पुल्टिस रोज रोज नई बनाकर बाँधनी चाहिए । 


11.झाई-मुहाँसे)-संतरा के छिल्कों का महीन चूर्ण गुलाब जल में मिलाकर झाई-मुहाँसों पर लेप करें या केवल ताजे छिल्के को उनपर रगड़ें, झाई-मुहाँसे साफ हो जायँगे इस प्रयोग से चेचक के दाग भी कुछ ही दिनों में दूर हो जाते हैं। 


12.सर्दी, खाँसी, जुकाम)-जाड़ों में गरम जल के साथ, और गमियों में ठंढे जल के साथ संतरें का रस मिलाकर पीने से सर्दी, खाँसी, जुकाम में लाभ होता है ।


 13.स्त्रियों के गर्भावस्था के उपद्रव) -डाई तोला संतरे के रस में शुद्ध मधु मिलाकर दिन में ३-४ बार पीने से गर्भावस्था में होनेवाले अतिसार, वमन, तथा अपच आदि सारे उपद्रव शान्त हो जाते हैं। 


14.उदर-पीड़ा)-जिस किसी के भी पेट में दर्द हो, उसे चाहिए कि दो तोले संतरे के रस में अन्दाज से भुनी हुई हींग मिलाकर पी ले, तत्काल लाभ होगा । 

15.अम्लपित्त)-यह एक भयानक उदर रोग है । इसमें कुछ पेट में डालते ही गड़बड़ी सी हो जाती है, दूध भी नहीं पचता, खट्टी डकारें आती हैं और कंठ व छाती में जलन होती मालूम देती है। इस रोग में संतरे के रस में थोड़ा भुना हुआ जीरा का चूर्ण व सेंधा नमक मिलाकर पिलाने से खराब से खराब अम्लपित्त रोग में लाभ होता है । 

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